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श्री सत्य नारायण गोयन्का

S.N Goenka Background, (English Language) Click Here
श्री गोयन्काजी का जन्म म्यंमा (बर्मा) में हुआ। वहां रहते हुए सौभाग्य से वे सयाजी उ बा खिन के संपर्क में आये एवं उनसे विपश्यना का प्रशिक्षण प्राप्त किया। चौदह वर्षों तक अपने गुरूदेव से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद श्री गोयन्काजी भारत आये और उन्होंने १९६९ में विपश्यना सिखाना शुरू किया। जातीयता एवं सांप्रदायिकता से प्रभावित भारत में श्री गोयन्काजी के शिविरों में समाज के हर तबक्के के हजारो लोग सम्मिलित हुए है। आज विश्व भर के लगभग १४० देशों के लोग विपश्यना शिविरों में भाग लेकर लाभान्वित होते हैं। 
श्री गोयन्काजी ने भारत में एवं विदेशों में ३०० से ज्यादा शिविरों का संचालन किया है एवं कईं हजारो लोगों को विपश्यना सिखायी है। शिविरों की बढ़ती मांग को देखकर १९८२ में उन्होंने सहायक आचार्य नियुक्त करना शुरू किया। उनके मार्गदर्शन में भारत, केनेडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूझीलैंड, फ्रान्स, स्पैन, बेल्जियम, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान, तैवान, श्रीलंका, बर्मा, थाईलैंड, नेपाल, ईरान, मेक्सिको, ब्राझील, आर्जेंटीना, साऊथ आफ्रीका, मंगोलिया आदि कईं देशों में विपश्यना केंद्रों की स्थापना हुई है। 
आज आचार्य गोयन्काजी जो विपश्यना सिखाते हैं, उसको लगभग २५०० वर्ष पूर्व भारत में भगवान बुद्ध ने पुन: खोज निकाला था। भगवान बुद्ध ने कभी भी सांप्रदायिक शिक्षा नहीं दी। उन्होंने धर्म (धम्म (Dhamma)) सिखाया जो कि सार्वजनीन है। विपश्यना सांप्रदायिकताविहीन विद्या है। यही कारण है कि यह विद्या विश्व भर सभी पृष्ठभूमियों के लोगों को आकर्षित करती है, चाहे वे किसी भी संप्रदाय के हो या किसी भी संप्रदाय में न विश्वास करने वाले हो। 

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युनो में शांति शिखर वार्ता
छायाचित्र Beliefnet, Inc. से साभार 
आचार्य गोयन्काजी को संयुक्त राष्ट्र संघ, न्युयॉर्क के जनरल एसेंब्ली हॉल में आयोजित सहस्राब्दि विश्व शांति संमेलन में विश्व के गण्यमान्य आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेताओं के साथ आमंत्रित किया गया था। २९ अगस्त २००० को संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव कोफी अन्नान ने इस संमेलन का उद्घाटन किया।
श्री सत्य नारायण गोयन्काजी द्वारा शांति संमेलन को दिया गया संबोधनबिल हिगिन्सअगस्त २९, २०००

न्युयॉर्क — आचार्य गोयन्काजी ने सहस्राब्दि विश्व शांति संमेलन के प्रतिनिधियों को राष्ट्र संघ के जनरल एसेंब्ली हॉल में, जहां कि पहली बार आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेताओं का संमेलन हो रहा था, संबोधित किया।

आचार्य गोयन्काजी ने कॉन्फ्लिंक्ट ट्रांसफॉर्मेशन नामक सत्र में भाषण दिया। इस सत्र में धार्मिक समन्वय, सहिष्णुता एवं शांतिपूर्व सह-अस्तित्व इन विषयों पर चर्चा हो रही थी। 
“बजाय इसके कि हम एक संप्रदाय से दूसरे संप्रदाय में रूपांतरण की बात सोचे”, गोयन्काजी ने कहा, “अच्छा होगा कि हम लोगों को दुःख से सुख की ओर, बंधन से मुक्ति की ओर, क्रूरता से करुणा की ओर ले चलें।” 
गोयन्काजी ने संमेलन के दोपहर के सत्र में लगभग दो हजार प्रतिनिधि एवं प्रेक्षकों के सामने यह भाषण दिया। यह सत्र सी.एन.एन. के संस्थापक टेड टर्नर के भाषण के बाद हुआ। 
शिखर संमेलन का विषय विश्व शांति है, इस को ध्यान में रखते हुए गोयन्काजी ने इस बात पर जोर डाला कि विश्व में शांति तब तक स्थापित नहीं हो सकती जबतक व्यक्तियों के भीतर शांति न हो। "विश्व में शांति तब तक स्थापित नहीं हो सकती जबतक व्यक्तियों के मन में क्रोध एवं घृणा है। मैत्री एवं करुणा भरे हृदय से ही विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है।" 
शिखर संमेलन का एक महत्वपूर्ण पहलू विश्व में सांप्रदायिक लड़ाई-झगड़ा एवं तनाव को कम करना है। इस के संबंध में गोयन्काजी ने कहा कि जब तक अंदर में क्रोध एवं द्वेष है, तब तक चाहे वह इसाई हो, हिंदू हो, मुसलमान हो या बौद्ध हो, दुःखी ही होगा। 
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उन्होंने कहा, “जिसके शुद्ध हृदय में प्रेम एवं करुणा है, वहीं भीतर स्वर्गीय सुख का अनुभव कर सकता है। यही निसर्ग का नियम है, चाहे तो कोई यह कह ले कि यहीं ईश्वर की इच्छा है।” 
विश्व के प्रमुख धार्मिक नेताओं की इस सभा में उन्होंने कहा, “हम सभी संप्रदायों के समान तत्वों पर ध्यान दें, उन्हें महत्व दें। मन की शुद्धता को महत्व दें जो कि सभी संप्रदायों का सार है। हम धर्म के इस अंग को महत्व दे एवं उपरी छिलकों को—सांप्रदायिक कर्मकांड, पर्व-उत्सव, मान्यताएं—नजरअंदाज करें।” 
अपने प्रवचन का सार बताते हुए गोयन्काजी ने सम्राट अशोक के एक शिलालेख को पढ़ा जिसमें उसने कहा है, “केवल अपने धर्म का सम्मान एवं दूसरे धर्मों का असम्मान नहीं करना चाहिए, बल्कि बहुत से कारणों से दूसरे धर्मों का सम्मान करना चाहिए। ऐसा करने से वह अपने धर्म की वृद्धि में सहायता तो करता ही है लेकिन दूसरे धर्मों की भी सेवा करता है। ऐसा न करे तो वह अपने धर्म की भी कब्र खोदता है और दूसर धर्मों को भी हानि पहुँचाता है। आपस में मिलकर रहना अच्छा है। दूसरों के धर्मों का जो उपदेश है उसे सभी सुनें एवं सुनने के लिए उत्सुक भी हों।” 
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव कोफी अन्नान ने आशा जताई कि इस शिखर परिषद में एकत्र हुए विश्व के प्रमुख आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेताओं की शांति की एकत्रित पुकार नये सहस्राब्दि में शांति बढ़ायेगी। 

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आचार्य गोयन्काजी का संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवचनविश्व शांति के लिए आंतरिक शांति आवश्यकविश्व शांति के लिए आंतरिक शांति आवश्यक,
२९ अगस्त, २००० को संयुक्त राष्ट्र संघ के जनरल एसेंब्ली हॉल में सहस्राब्दि विश्व शांति संमेलन के प्रतिनिधियों के सामने आचार्य गोयन्काजी द्वारा दिये गये प्रवचन का हिंदी अनुवाद 
मित्रो, आध्यात्मिक एवं धार्मिक जगत के नेताओ! 
आज हम सबको एकत्र होकर मानवता की सेवा करने का एक उत्तम अवसर उपलब्ध हुआ है। धर्म एकता लाए तो ही धर्म है। यदि फूट डालता है, तो वह धर्म नहीं है। 
आज यहा कन्वर्जन के पक्ष में एवं विपक्ष में बहुत चर्चा हुई। मैं कन्वर्जन के पक्ष में हूं, विरोध में नहीं। लेकिन एक संप्रदाय से दूसरे संप्रदाय में नहीं, बल्कि कन्वर्जन दुःख से सुख में, बंधन से मुक्ति में, क्रूरता से करुणा में होना चाहिए। आज ऐसे ही परिवर्तन की आवश्यकता है और इसी के लिए इस महासभा में प्रयास करना है। 
पुरातन भारत ने विश्व की समग्र मानवता को शांति एवं सामंजस्य का संदेश दिया। पर केवल इतना ही नहीं। शांति एवं सामंजस्य प्राप्त करने का तरिका भी दिया, विधि भी दी। मुझे ऐसा लगता है कि मानव समाज में यदि सचमुच शांति स्थापित करनी है, तो हमें हर एक व्यक्ति को महत्व देना होगा। अगर प्रत्येक व्यक्ति के मन में शांति नहीं है तो विश्व में वास्तविक शांति कैसे होगी? यदि मेरा मन व्याकुल है, हमेशा क्रोध, वैर, दुर्भावना एवं द्वेष से भरा रहता है, तो मैं विश्व को शांति कैसे प्रदान कर सकता हूं? ऐसा कर ही नहीं सकता क्यों कि स्वयं मुझमें शांति नहीं है। इसलिए संतों एवं प्रबुद्धों ने कहा है, “शांति अपने भीतर खोजो।” स्वयं अपने भीतर निरिक्षण करके देखना है कि क्या सचमुच मुझमें शांति है। विश्व के सभी संतो, सत्पुरुषों एवं मुनियों ने यहीं सलाह दी — अपने आप को जानो। माने केवल बुद्धि के स्तर पर नहीं, भावावेश में आकर या श्रद्धा के मारे स्वीकार मत कर लेना, बल्कि जब अपनी अनुभूति के स्तर पर अपने बारे में सच्चाई को जानेंगे तब जीवन की समस्याओं का स्वतः समाधान होता चला जायगा। 
ऐसा होने पर व्यक्ति सर्वव्यापी निसर्ग के नियम को, कुदरत के कानून को या यूं कहे ईश्वर की इच्छा को समझने लगता है। यह कानून सब पर लागू होता है। यदि मैं अपने भीतर निरिक्षण करूं तो देखूंगा कि जैसे ही मन में कोई मैल जागता है, शरीर में उसका प्रतिक्रिया अनुभूत होने लगती है। शरीर गरम हो जाता है, जलने लगता है, धड़कन बढ़ जाती है, तनाव मालूम होता है। मैं व्याकूल हो जाता हूं। भीतर मैल जगाकर तनाव पैदा करता हूं तो अपनी व्याकुलता केवल अपने तक ही सीमित नहीं रखता। उसे औरों को भी बांटता हूं। अपने आस-पास के वातावरण को इतना तनावपूर्ण बना देता हूं कि जो मेरे संपर्क में आता है वही व्याकुल हो जाता है। मैं चाहे कितनी ही सुख-शांति की बाते करूं, मेरे भीतर क्या हो रहा है, यह शब्दों से अधिक महत्त्वपूर्ण है। और यदि मेरा मन निर्मल है तो कुदरत का दूसरा कानून काम करने लगता है। जैसे ही मेरा मन निर्मल हुआ, यह कुदरत या ईश्वर मुझे पुरस्कार या देने लगता है। मुझे शांति का अनुभव होता है। इसे मैं अपने भीतर स्वयं देख सकता हूं। 
कोई चाहे, किसी भी संप्रदाय का, परंपरा का, देश का हो जब वह कुदरत के कानून को तोड़ कर मन में मैल जगाता है तो दुःखी होता ही है। कुदरत स्वयं दंड देती है। कुदरत के कानून को तोड़ने वाला तात्काल नारकिय यातना का अनुभव करता है। इस समय नारकीय दुःख का बीज बो रहे हैं, तो मृत्यु के पश्चात भी नारकिय दुःख ही मिलेगा। वैसे ही, अगर मैं मन को शुद्ध रखूं, मैत्री एवं करुणा से भरूं तो अब भी अपने भीतर स्वर्गीय सुख भोगता हूं और यह बीज मरने के बाद भी स्वर्गीय सुख ही लायेगा। मैं अपने आपको चाहे हिंदू कहूं, इसाई, मुस्लिम, बौद्ध, जैन कुछ भी कहूं कोई फर्क नहीं पड़ता। मनुष्य मनुष्य है, मनुष्य का मानस मनुष्य का मानस है। 
अतः कन्वर्जन होना ही चाहिए — मन की अशुद्धता का, मन की शुद्धता में। यह कन्वर्जन लोगों में आश्चर्यकारक बदलाव लायेगा। यह कोई जादू या चमत्कार नहीं, बल्कि अपने भीतर शरीर एवं चित्त के पारस्पारिक संस्पर्श को ठीक से जानने का परिणाम है, जो एक विशुद्ध विज्ञान है। कोई भी अभ्यास करने पर समझ सकता है कि मन किस प्रकार शरीर को प्रभावित करता है और शरीर किस प्रकार मन को प्रभावित करता है। बड़े धीरज के साथ जब इसका निरिक्षण करते जाते हैं तो कुदरत का कानून बड़ा स्पष्ट होता जाता है कि जब भी हम चित्त में मैल जगाते हैं, दुःखी होते है और जैसे ही चित्त मैल से विमुक्त हो जाता है, शांति-सुख का अनुभव करने लगते हैं। आत्म निरीक्षण की इस विधि का अभ्यास कोई भी कर सकता है। 
प्राचीन काल में भगवान बुद्ध द्वारा सिखाई गई यह विद्या विश्वभर में फैली। आज भी विभिन्न वर्गों के, संप्रदायों के लोग आकर इस विद्या को सीखते हैं और वही लाभ प्राप्त करते हैं। वे अपने आपको हिंदू, मुसलमान, बौद्ध, इसाई कहते रहें, इन नामों से कोई फर्क नहीं पड़ता। मनुष्य मनुष्य है, फर्क इसी बात से होगा कि वे अभ्यास द्वारा वास्तव में धार्मिक बनें, मैत्री एवं करुणा से परिपूर्ण हो जायँ। उनके कर्म स्वयं अपने लिए एवं औरों के लिए अच्छे हो जायँ। जब कोई व्यक्ति अपने भीतर शांति जगाता है, तो उसके आसपास का सारा वातावरण शांति की तरंगों से भर उठता है। उसके संपर्क में जो भी आता है वही शांति अनुभव करता है। यह मानसिक परिवर्तन ही सही परिवर्तन है, सही कन्वर्जन है। आवश्यकता इसी बात की है। अन्यथा सभी बाह्य परिवर्तन निरर्थक हैं। 
मैं विश्व को भारत का एक अनमोल संदेश पढ़कर सुनाने की अनुमति चाहता हूं। आदर्श शासक सम्राट अशोक के २३०० वर्ष पूर्व पत्थर पर खुदे ये शब्द बताते है कि शासन कैसे करना है। 
“हमें केवल अपने धर्म (संप्रदाय) को सम्मान देकर दूसरे संप्रदायों की निंदा नहीं करनी चाहिए।” आज इस संदेश का बहुत बड़ा महत्त्व है। दूसरे संप्रदाय की निंदा करके अपने संप्रदाय की सर्वोत्तमता सिद्ध करते हुए व्यक्ति मानवता के लिए बहुत बड़ी कठिनाई पैदा करता है। फिर अशोक कहता है, “इसके बजाय नाना कारणों से दूसरे संप्रदायों का सम्मान करना चाहिए।” हर संप्रदाय का सार मैत्री, करुणा एवं सद्भावना है। इस सार को समझते हुए हमें हर धर्म का सम्मान करना चाहिए। छिलके हमेशा भिन्न होते हैं—तरह तरह के रीति-रिवाज, कर्मकांड, अनुष्ठान, धारणाएं होंगी। उन सबको लेकर झगड़ने के बजाय उनके भीतर के सार को महत्त्व देना चाहिए। अशोक के अनुसार, “ऐसा करके हम अपने ही धर्म (संप्रदाय) को बढ़ावा देते हैं और दूसरे धर्मों की भी सेवा करते हैं। इसके विपरीत व्यवहार करके हम अपने संप्रदाय की भी हानि करते हैं और दूसर संप्रदाय को भी हानि पहुँचाते हैं।” 
यह संदेश हम सबको गंभीर चेतावनी देता है कि जो कोई व्यक्ति अपने संप्रदाय के प्रति अति श्रद्धा के मारे दूसरे संप्रदाय की निंदा करते हुए यह सोचता है कि ऐसा करके मैं अपने संप्रदाय की शान बढ़ाऊंगा, वह अपने कृत्यों से अपने ही संप्रदाय की हानि करता है। 
अंत में अशोक सर्वव्यापी धर्मनियामता का संदेश प्रस्तुत करता है। “आपस में मिलकर रहना अच्छा है। झगड़ा नहीं करना चाहिए। दूसरों संप्रदायों के जो उपदेश है उसे सभी सुनें एवं सुनने के लिए उत्सुक भी हों।” 
अस्वीकार करने एवं निंदा करने के बजाय, हम हर संप्रदाय के सार को महत्त्व दें तभी समाज वास्तविक शांति एवं सौमनस्य स्थापित होगा। 
सब का मंगल हो।